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Showing posts from 2019
तुम आज फिर आ गए  ? मेरी गुजरती जिंदगी का खूबसूरत अफसाना बनकर , क्यों याद आ गये अचानक तुम्हें वो लम्हे ,  जो गुजारे ही नहीं थे साथ-साथ हमने , तुमने नहीं की कोई कोशिश मिलने की मुझसे , न किसी बहाने की तुम्हें दरकार थी , तुम्हारी देह का कभी मेरे देह की खुशबू से वास्ता ही नहीं पड़ा , रूहों की बातें  तुम्हें तिलस्मी लगती होगी ,  मुझे नहीं , मेरी रूह को छूकर जब तुम गुजरे ,  मैं तब भी वहीं थी , तुम्हारी किताबों की अलमारी के पास , सोच रही थी कि शायद चाय पीकर तुम उठोगे  और टटोलोगे कोई पीली जिल्द वाली किताब जिसका शीर्षक शायद मेरे नाम से मिलता-जुलता होगा , और शायद तुम्हें मेरा ख्याल आएगा , उफ़्फ़!!!  ये कैसी गलतफहमियाँ है इन दिनों, तुम उठे लेकिन कोई नई चमकीली जिल्द वाली, किताब को उठाने , जो तुम्हें अच्छी लगती है ,  बेइन्तहा इसलिए नहीं कि उस किताब के अक्षर जादुई है, बल्कि उस किताब की नई खुशबू तुम्हें आकर्षित करती है...
स्त्री का ज़िंदगीनामा-कड़ी-१ ज़िंदगी जब अपनी गलबहियाँ डालकर हमसे बतियाती है तो जैसे लगता हैं कि दिल की सारी दराजें खोल कर जिंदगी के हर लम्हों के दस्तावेज़ खोल कर रख दें उसके सामने।  यहाँ ज़िंदगी है और मैं हूँ एक स्त्री , लेकिन मेरी जगह ‘ ये ’ भी हो सकती है और ‘ वो ’ भी। बदलेगा नहीं तो सिर्फ और सिर्फ हम सबका ज़िंदगीनामा , हम स्त्रियों का ज़िंदगीनामा....... आज एकांत में बैठकर सोचती हूँ तो लगता हैं ख़यालों ने अक्सर हम स्त्रियों को ऊर्जावान बनाया , क्रियाशील बनाया।  ज़िंदगी ने कभी भी हमसे वक़्त का हिसाब नहीं माँगा।  जब चाहा तब  फुर्सत के लम्हों में हाथों में हाथ डालकर बैठ गयी।  और हमने  भी उससे यारियाँ कर ली।  बड़ी अच्छी बनती है हमारी ज़िंदगी से , जबसे हमने उसे समझा।   ज़िंदगी के सफ़र में आने वाले दुख-सुख का उससे न कोई जिक्र हुआ , न हमारे बीच सवाल-जवाब का सिलसिला चला।  अच्छा हैं न...दरमियान ख़ामोशी हो तो ज़िंदगी सुकून से गुजर जाती है।  हालांकि कभी इम्तिहान भी लेती है ज़िंदगी लेकिन हमेशा अपनी सकारात्मक सोच और अपने हौसले से ज़िंदगी का ...

alfaz boye the..

                    अल्फ़ाज़ बोये थे बंद करके होंठों को , कुछ न कह पाने की लाचारी , आदत है , मजबूरी है , या शायद हुई कोई बीमारी ? देखो कैसे चीखती है , ख़ामोशी हलकान होकर , शब्द-शब्द कुंठित बैठा है , ज़हर का घूंट पीकर , झूठ का शोर इतना , कि आवाज़ दहशत से हारी.... कितने अल्फ़ाज़ बोये थे , खामोशियों के खेत में , घर बन गए अनजाने में , मरुस्थल की रेत में , आई दर्द की बाढ़ , बर्बाद हो गयी फसल सारी... हर तरफ शोर है , कहकहे हैं , बातों का बाज़ार है , न कोई सुनता है , न शब्दों का कहीं आधार हैं , फिर भी मेरी ख़ामोशी है , कोलाहल पर भारी... न देना चुनौती शब्दों को , वो आँसू पिए बैठे है ,   जाने कितने , कैसे , मुँह में हथियार लिए बैठे हैं , जंग लगी नहीं इनमें , ये तलवार दोधारी है... हर दरवाज़ा , झरोखा एहतियात से बंद कर दिया , दिल के छेदों में भी दर्द , ख़ामोशी का भर दिया , घर के कोने-कोने में , ढूँढती आवाज़ मारी-मारी... बंद करके होंठों को , कुछ न कह पाने की लाचारी.... @ डॉ सुषमा...

मख़मली नर्म धूप

ये जो सुबह की मख़मली नर्म धूप है न ! ये नए दिन के स्वागत में बड़ी प्रसन्न होती है... इस जीवन को कितने नए आयाम देती है, ईश्वर की अद्भुत रचना को अर्थ देती है...  ये जो सुबह की कोमल किरणें हैं न ! एहसास के झरोखें हौले-से खोल देती हैं... भोर की शीतलता में जरा-सा ताप घोल देती हैं,  सुबह की चाय में तनिक अदरक का स्वाद मिला देती है... ये जो सुबह की हल्की-सी ठंड की छुअन हैं न ! ये बीते दिन की थकान सारी उड़ा ले जाती है... सृष्टि के कण-कण में, निर्झरता की पाती पहुंचा आती है, द्वार-द्वार पर सुबह का पावन स्तवन-वाचन करती है....  ये जो आज की नवी-नवेली सुबह है न ! सभी आत्मीयजनों को हृदय से शुभकामनायें देती है...  देहरी पर बैठकर मौसम के गीत गुनगुनाती है, जीवन के धूप-छाँव की कथा मौन बाँचती है.... #Dr Sushmaa Gajapure  Photo Credits: Dr. Sushmaa Gajapure Location: Bhopal- Indore: Highway

ज़िंदगी अभी बाकी है...

ज़िंदगी अभी बाक़ी है...   साँस भले हो हो मद्दम -मद्दम , ज़िंदगी अभी बाक़ी है...  बुझते चिराग़ों में सिहरती, रोशनी अभी बाक़ी है...  ये रात, ये सबेरा, ये शामों का सिलसिला हैं... कौन किसमें समा जाएँ, ये  सवाल अभी बाक़ी है... कोई रास्ता या गली कोई, रहती नहीं गुमसुम कभी...  अच्छा है कुछ राहगीरों में, आवारगी अभी बाक़ी हैं...  जमाने भर का लिए दर्द, ये कायनात सिसकती है... किसी कोने में सुबकती, थोड़ी इंसानियत अभी बाक़ी है.... *डॉ सुषमा गजापुरे 

पुरुषत्व दुराचार का

   मस्तिष्क में उठते      घिनौने,विकृत विचारों का    'लोग' अब वमन करते     गरम चाय के प्यालों से     उठती तेज़ भाप-सा    भड़ास वासनाओं की निकालते 'पुरुषत्व दुराचार का' खड़ा वेताल-सा चौराहे पर औरत की देह ताकता चिपक जाती दृष्टियाँ कुत्सित  बेशर्मी से उनके उभारों पर  पान की पीक के साथ करता 'वो' कलंकित औरत के सम्मान को विचार लज्जाहीन, मर्यादाहीन हो जाते सारे संस्कारों और आदर्शों से परे  और सरल हो जाता 'उसे' करना बलात्कार आँखों से अवसरवादियों की भीड़ में  रेंगते हैं विषेले-सर्प से हाथ उसके  साथ खड़ी असहज स्त्री के देह पर वासना कुटिल हँसती निर्लज्ज होकर  'वह पुरुष' हो जाता है उस समय  सारे सामाजिक सम्बन्धों से परे    उस समय 'वह' केवल एक 'पुरुष'  और सिर्फ 'वासनामयी पुरुष'होता है  और पुरुष प्रधान समाज का  कड़वा सच निगल जाता है  संरक्षक कैसे होगा 'पुरुष ऐसा समाज...

दुःख के सामान की पोटली

बहुत दिन हुए झाड़ी नहीं थी दुःख के सामान की पोटली खंगाली भी नहीं थी रोज़मर्रा की उलझनों में बेवजह उलझता रहा मन यूं ही हर बात पर और सच तो ये भी कि वक़्त ही नहीं मिला खंगालने का पोटली को बस यूं ही जानबूझकर                                                   टालती रही अबतक और वैसे भी था वो सामान कितना पुराना टूटा फूटा कबाड़ियों वाला अच्छा है न पड़ा रहे कहीं अटारी पर या स्टोर रूम के किसी अँधेरे कोने में टँगी रहे किसी खूँटी पर पोटली दुख के सामान की बिटिया के विवाह पर जब होगी रंगाई पुताई तो साथ साथ उभर आएंगे तमाम घाव रिसते हुए दीवार की पपड़ियों के संग खुरच जायेंगे पुराने सामान और कपड़ों के साथ ले जायेगी वो पोटली घर की बाई कामवाली हंसी ठिठोली की रस्मो में भला इस पोटली का क्या काम ~~~~~~सुषमा~~~~~~~~