अल्फ़ाज़ बोये थे बंद करके होंठों को , कुछ न कह पाने की लाचारी , आदत है , मजबूरी है , या शायद हुई कोई बीमारी ? देखो कैसे चीखती है , ख़ामोशी हलकान होकर , शब्द-शब्द कुंठित बैठा है , ज़हर का घूंट पीकर , झूठ का शोर इतना , कि आवाज़ दहशत से हारी.... कितने अल्फ़ाज़ बोये थे , खामोशियों के खेत में , घर बन गए अनजाने में , मरुस्थल की रेत में , आई दर्द की बाढ़ , बर्बाद हो गयी फसल सारी... हर तरफ शोर है , कहकहे हैं , बातों का बाज़ार है , न कोई सुनता है , न शब्दों का कहीं आधार हैं , फिर भी मेरी ख़ामोशी है , कोलाहल पर भारी... न देना चुनौती शब्दों को , वो आँसू पिए बैठे है , जाने कितने , कैसे , मुँह में हथियार लिए बैठे हैं , जंग लगी नहीं इनमें , ये तलवार दोधारी है... हर दरवाज़ा , झरोखा एहतियात से बंद कर दिया , दिल के छेदों में भी दर्द , ख़ामोशी का भर दिया , घर के कोने-कोने में , ढूँढती आवाज़ मारी-मारी... बंद करके होंठों को , कुछ न कह पाने की लाचारी.... @ डॉ सुषमा...