मस्तिष्क में उठते
घिनौने,विकृत विचारों का
'लोग' अब वमन करते
गरम चाय के प्यालों से
उठती तेज़ भाप-सा
भड़ास वासनाओं की निकालते
'पुरुषत्व दुराचार का'
खड़ा वेताल-सा चौराहे पर
औरत की देह ताकता
चिपक जाती दृष्टियाँ कुत्सित
बेशर्मी से उनके उभारों पर
पान की पीक के साथ करता 'वो'
कलंकित औरत के सम्मान को
विचार लज्जाहीन, मर्यादाहीन
हो जाते सारे संस्कारों और आदर्शों से परे
और सरल हो जाता 'उसे' करना
बलात्कार आँखों से
अवसरवादियों की भीड़ में
रेंगते हैं विषेले-सर्प से हाथ उसके
साथ खड़ी असहज स्त्री के देह पर
वासना कुटिल हँसती निर्लज्ज होकर
'वह पुरुष' हो जाता है उस समय
सारे सामाजिक सम्बन्धों से परे
उस समय 'वह' केवल एक 'पुरुष'
और सिर्फ 'वासनामयी पुरुष'होता है
और पुरुष प्रधान समाज का
कड़वा सच निगल जाता है
संरक्षक कैसे होगा 'पुरुष ऐसा
समाज का, परिवार का
जो औरत के सम्मान पर
स्वयं बैठा है घात लगा......
-सुषमा गजापुरे
Comments