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ज़िंदगी अभी बाकी है...

ज़िंदगी अभी बाक़ी है... 

साँस भले हो हो मद्दम -मद्दम ,

ज़िंदगी अभी बाक़ी है... 
बुझते चिराग़ों में सिहरती,
रोशनी अभी बाक़ी है... 

ये रात, ये सबेरा,

ये शामों का सिलसिला हैं...
कौन किसमें समा जाएँ,
ये  सवाल अभी बाक़ी है...

कोई रास्ता या गली कोई,

रहती नहीं गुमसुम कभी... 
अच्छा है कुछ राहगीरों में,
आवारगी अभी बाक़ी हैं... 

जमाने भर का लिए दर्द,

ये कायनात सिसकती है...
किसी कोने में सुबकती,
थोड़ी इंसानियत अभी बाक़ी है....

*डॉ सुषमा गजापुरे 

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