तुम आज फिर आ गए ?
मेरी गुजरती जिंदगी का खूबसूरत अफसाना बनकर,
क्यों याद आ गये अचानक तुम्हें
वो लम्हे, जो गुजारे ही नहीं थे साथ-साथ हमने,
तुमने नहीं की कोई कोशिश मिलने की मुझसे,
न किसी बहाने की तुम्हें दरकार थी,
तुम्हारी देह का कभी मेरे देह की खुशबू से वास्ता ही नहीं पड़ा,
रूहों की बातें तुम्हें तिलस्मी लगती होगी, मुझे नहीं,
मेरी रूह को छूकर जब तुम गुजरे, मैं तब भी वहीं थी,
तुम्हारी किताबों की अलमारी के पास,
सोच रही थी कि शायद चाय पीकर तुम उठोगे
और टटोलोगे कोई पीली जिल्द वाली किताब
जिसका शीर्षक शायद मेरे नाम से मिलता-जुलता होगा,
और शायद तुम्हें मेरा ख्याल आएगा,
उफ़्फ़!!! ये कैसी गलतफहमियाँ है इन दिनों,
तुम उठे लेकिन कोई नई चमकीली जिल्द वाली,
किताब को उठाने,
जो तुम्हें अच्छी लगती है, बेइन्तहा
इसलिए नहीं कि उस किताब के अक्षर जादुई है,
बल्कि उस किताब की नई खुशबू तुम्हें आकर्षित करती है,
तुम रूह की नहीं देह की खुशबू ढूंढ रहे थे
और मैं...बेवजह इसे प्रेम मान बैठी थी,
तुम ने कभी सोचा कि स्त्री क्यों पड़ती है,
एक साधारण पुरुष के प्रेम में,
तब भी, जब उसके साथ कोई एक स्त्री,
रसोईघर के तेज मसालों के गंध वाले कपड़े पहने ,
रोज़मर्रा की तल्खी और गृहस्थी के तमाम
झमेलों के साथ वहाँ पूरी उपस्थित होती है,
वक़्त ने कभी मौका नहीं दिया और,
तुम्हारे पास वक़्त नहीं था और उसके पास शब्द,
ये बताने और जताने के लिए कि उसके प्रेम का स्त्रोत,
हिमालय से नहीं बल्कि,
रेगिस्तान की बावड़ी से निकल रहा है,
जो तुम्हें तृप्ति की असीम अनुभूति से दूर रहकर भी,
हौले-हौले सहलाएगा ,
तुम देह से अधिक कुछ सोच ही नहीं पाये कि
एक स्त्री क्यों प्रेम करती है एक साधारण पुरुष से,
दरअसल वो अपने आप से प्रेम कर रही होती है उन दिनों,,,
तुम भी गलतफहमियों में मत रहना
और लौटकर आ ही जाना एकदिन
सुषमा
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