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स्त्री का ज़िंदगीनामा-कड़ी-१ ज़िंदगी जब अपनी गलबहियाँ डालकर हमसे बतियाती है तो जैसे लगता हैं कि दिल की सारी दराजें खोल कर जिंदगी के हर लम्हों के दस्तावेज़ खोल कर रख दें उसके सामने।  यहाँ ज़िंदगी है और मैं हूँ एक स्त्री , लेकिन मेरी जगह ‘ ये ’ भी हो सकती है और ‘ वो ’ भी। बदलेगा नहीं तो सिर्फ और सिर्फ हम सबका ज़िंदगीनामा , हम स्त्रियों का ज़िंदगीनामा....... आज एकांत में बैठकर सोचती हूँ तो लगता हैं ख़यालों ने अक्सर हम स्त्रियों को ऊर्जावान बनाया , क्रियाशील बनाया।  ज़िंदगी ने कभी भी हमसे वक़्त का हिसाब नहीं माँगा।  जब चाहा तब  फुर्सत के लम्हों में हाथों में हाथ डालकर बैठ गयी।  और हमने  भी उससे यारियाँ कर ली।  बड़ी अच्छी बनती है हमारी ज़िंदगी से , जबसे हमने उसे समझा।   ज़िंदगी के सफ़र में आने वाले दुख-सुख का उससे न कोई जिक्र हुआ , न हमारे बीच सवाल-जवाब का सिलसिला चला।  अच्छा हैं न...दरमियान ख़ामोशी हो तो ज़िंदगी सुकून से गुजर जाती है।  हालांकि कभी इम्तिहान भी लेती है ज़िंदगी लेकिन हमेशा अपनी सकारात्मक सोच और अपने हौसले से ज़िंदगी का ...

ज़िंदगी अभी बाकी है...

ज़िंदगी अभी बाक़ी है...   साँस भले हो हो मद्दम -मद्दम , ज़िंदगी अभी बाक़ी है...  बुझते चिराग़ों में सिहरती, रोशनी अभी बाक़ी है...  ये रात, ये सबेरा, ये शामों का सिलसिला हैं... कौन किसमें समा जाएँ, ये  सवाल अभी बाक़ी है... कोई रास्ता या गली कोई, रहती नहीं गुमसुम कभी...  अच्छा है कुछ राहगीरों में, आवारगी अभी बाक़ी हैं...  जमाने भर का लिए दर्द, ये कायनात सिसकती है... किसी कोने में सुबकती, थोड़ी इंसानियत अभी बाक़ी है.... *डॉ सुषमा गजापुरे