तुम आज फिर आ गए ? मेरी गुजरती जिंदगी का खूबसूरत अफसाना बनकर , क्यों याद आ गये अचानक तुम्हें वो लम्हे , जो गुजारे ही नहीं थे साथ-साथ हमने , तुमने नहीं की कोई कोशिश मिलने की मुझसे , न किसी बहाने की तुम्हें दरकार थी , तुम्हारी देह का कभी मेरे देह की खुशबू से वास्ता ही नहीं पड़ा , रूहों की बातें तुम्हें तिलस्मी लगती होगी , मुझे नहीं , मेरी रूह को छूकर जब तुम गुजरे , मैं तब भी वहीं थी , तुम्हारी किताबों की अलमारी के पास , सोच रही थी कि शायद चाय पीकर तुम उठोगे और टटोलोगे कोई पीली जिल्द वाली किताब जिसका शीर्षक शायद मेरे नाम से मिलता-जुलता होगा , और शायद तुम्हें मेरा ख्याल आएगा , उफ़्फ़!!! ये कैसी गलतफहमियाँ है इन दिनों, तुम उठे लेकिन कोई नई चमकीली जिल्द वाली, किताब को उठाने , जो तुम्हें अच्छी लगती है , बेइन्तहा इसलिए नहीं कि उस किताब के अक्षर जादुई है, बल्कि उस किताब की नई खुशबू तुम्हें आकर्षित करती है...