बहुत दिन हुए
झाड़ी नहीं थी
दुःख के सामान की पोटली
खंगाली भी नहीं थी
रोज़मर्रा की उलझनों में
बेवजह उलझता रहा मन
यूं ही हर बात पर
और सच तो ये भी
कि वक़्त ही नहीं मिला
खंगालने का पोटली को
बस यूं ही जानबूझकर
टालती रही अबतक
था वो सामान कितना पुराना
टूटा फूटा कबाड़ियों वाला
अच्छा है न
पड़ा रहे कहीं अटारी पर
या
स्टोर रूम के किसी
अँधेरे कोने में
टँगी रहे किसी खूँटी पर
पोटली दुख के सामान की
बिटिया के विवाह पर
जब होगी रंगाई पुताई
जब होगी रंगाई पुताई
तो साथ साथ उभर आएंगे
तमाम घाव रिसते हुए
दीवार की पपड़ियों के संग
खुरच जायेंगे
पुराने सामान और कपड़ों के साथ
ले जायेगी वो पोटली
घर की बाई कामवाली
हंसी ठिठोली की रस्मो में
भला इस पोटली का क्या काम
~~~~~~सुषमा~~~~~~~~
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