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स्त्री का ज़िंदगीनामा-कड़ी-१





ज़िंदगी जब अपनी गलबहियाँ डालकर हमसे बतियाती है तो जैसे लगता हैं कि दिल की सारी दराजें खोल कर जिंदगी के हर लम्हों के दस्तावेज़ खोल कर रख दें उसके सामने।  यहाँ ज़िंदगी है और मैं हूँ एक स्त्री, लेकिन मेरी जगह ये भी हो सकती है और वो भी। बदलेगा नहीं तो सिर्फ और सिर्फ हम सबका ज़िंदगीनामा,हम स्त्रियों का ज़िंदगीनामा.......
आज एकांत में बैठकर सोचती हूँ तो लगता हैं ख़यालों ने अक्सर हम स्त्रियों को ऊर्जावान बनाया, क्रियाशील बनाया।  ज़िंदगी ने कभी भी हमसे वक़्त का हिसाब नहीं माँगा।  जब चाहा तब  फुर्सत के लम्हों में हाथों में हाथ डालकर बैठ गयी।  और हमने  भी उससे यारियाँ कर ली।  बड़ी अच्छी बनती है हमारी ज़िंदगी से, जबसे हमने उसे समझा।   ज़िंदगी के सफ़र में आने वाले दुख-सुख का उससे न कोई जिक्र हुआ, न हमारे बीच सवाल-जवाब का सिलसिला चला।  अच्छा हैं न...दरमियान ख़ामोशी हो तो ज़िंदगी सुकून से गुजर जाती है।  हालांकि कभी इम्तिहान भी लेती है ज़िंदगी लेकिन हमेशा अपनी सकारात्मक सोच और अपने हौसले से ज़िंदगी का दिल जीतती गयी एक स्त्री....ख़ामोशी में बड़ी बातें होती है ज़िंदगी से।  कभी दिलकश कभी यूँ ही अलमस्त।   हम स्त्रियाँ वैसे भी वक़्त के साथ आगे बढ़ने, खुद को जानने और समझने का हुनर जानती हैं इसलिए न कोई गीला है, न शिकवा है ज़िंदगी से।  स्त्री तुम सृष्टि का एक खूबसूरत तोहफा हो और ज़िंदगी तुम भी बेहद हसीन हो...    
हम हमेशा ज़िंदगी को कोसते हैं, अपनी पीड़ाओं के लिए, ग़म के लिए, दर्द के लिए, अपनी हार के लिए, अपनी नाकामयाबियों के लिए...लेकिन हम एक बार भी नहीं करते अपना आत्मविश्लेषण। हम जरूरत भी नहीं समझते यह मान कर कि हम हमेशा सही हैं और ज़िंदगी बड़ी ज़ालिम, बड़ी बेईमान।  हालांकि वो हमे कई मौके देती है लेकिन दरअसल हम स्त्रियाँ अपने “मैं” से निकल ही नहीं पाती।   हमने एक दायरा बना लिया हैं कि मेरी क्षमता, मेरी ताक़त, मेरी सीमाएं बस इतनी ही है।  हम स्त्रियाँ कभी माँ, कभी बहन, कभी बहू तो कभी बेटी बनकर ज़िंदगी को नया अर्थ देती है।  क्या खोया, क्या पाया के बीच भी कितने प्रश्नों के उत्तर धराशायी हो जाते है लेकिन आखिर ज़िद हमेशा हार कर भी जीत जाती है और हम एक झूठे सिकंदर की तरह जश्न मनाते है...ज़िंदगी तब भी हौले-हौले मुसकुराती रहती है... एक स्त्री के जीने का हौसला और उमंग एक परिवार ही नहीं बल्कि एक समाज और सम्पूर्ण राष्ट्र को बदल देता है।  नयी ऊंचाइयों पर पहुंचा देता है।
आइये आगे बढ़ कर थाम लें ज़िंदगी का हाथ। चल पड़े उस सफ़र पर जहां इम्तिहान भी है, रुकावटें भी, लोगों की खुसपुसाहट भी लेकिन इन सबके साथ ही तो ज़िंदगी चलती है साथ अपने, बिना किसी शर्तों के।
ज़िंदगीनामा के अगले सफ़र में फिर किसी सराय पर हम सब सखी-सहेलियाँ कहीं साथ रुकेंगे और फिर सुनाऊँगी मैं आपको ज़िंदगी की नयी कहानी, ज़िंदगी का नया फलसफ़ा.... क्रमश:.....
डॉ सुषमा गजापुरे

Comments

Unknown said…
Wah bahut hi badiya marmik rachna Didi

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